महेश्वर शिव — आदिगुरु एवं सर्वव्यापी चेतना
परम आदरणीय साहब श्री हरीन्द्रानंद जी का विचार-संदेश
"वंदे जगद्गुरुं महेश्वरम्"
भारतीय अध्यात्म के सिंहावलोकन से स्पष्ट होता है कि महेश्वर शिव चिरकाल से आदिगुरू एवं गुरू पद पर अवस्थित हैं। ग्रंथों में शिव के शिष्यों और प्रशिष्यों का नामोल्लेख मिलता है। पुरातन काल से शिव को रुद्र, पशुपति, ईश्वर, मृत्युंजय, देवाधिदेव, महाकाल, महेश्वर, जगद्गुरु आदि उपाधियों से विभूषित किया गया है।
परमात्मा को 'शिव' संबोधित किया गया है। सूक्ष्मातिसूक्ष्म परम चैतन्यात्मा को ही ईश्वर, परमेश्वर, शिव, परमात्मा अथवा आत्मा आदि शब्दों से विभूषित किया गया है। निराकार या साकार शिव की महिमा में प्रयुक्त सभी उपाधियाँ महेश्वर पद को इंगित करती हैं।
"गुरु अपने शिष्य के व्यक्तित्व के सर्वोत्तम पक्ष को उजागर करते हैं और परम चेतना से उसका ऐक्य सुनिश्चित करते हैं। महेश्वर शिव को भी अपने शिष्य के स्तर पर आकर उसे पूर्ण ज्ञान की स्थिति में ले जाना होता है।"
— साहब श्री हरीन्द्रानंद जीमहेश्वर शिव की गुरु सत्ता से जुड़ने का मार्ग अत्यंत सरल और सुलभ है। किसी भी कर्मकांड या कठिन अनुष्ठान के बिना, केवल भाव और निष्ठा से ३ सूत्रों का पालन करके कोई भी मनुष्य शिव का शिष्य बन सकता है:
दया माँगना
"हे शिव! आप मेरे गुरु हैं, मुझ पर दया कर दीजिए।"
चर्चा करना
दूसरों से शिव की गुरुता की चर्चा करना व प्रेरित करना।
प्रणाम करना
शिव गुरु के चरणों में मन ही मन प्रणाम (नमः शिवाय) करना।